Thursday, 12 May 2016

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एक कहावत है, ‘एक रास्ता बंद होता है, तो हजार रास्ते खुलते हैं’. जब इंसान के सपनों की ओर जानेवाला रास्ता बंद हो जाये और लगे कि अब सब कुछ समाप्त हो गया है, उस एक क्षण में इस कहे गये में छिपी ताकत बेहद मददगार साबित हो सकती है. परीक्षाओं के इस मौसम में आप भी अपने बच्चों को इस ताकत का एहसास कराएं..
दसवीं, बारहवीं की बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम आने लगे हैं. इसके साथ ही अखबारों में ऐसे शीर्षक भी नजर आने लगे हैं,‘खराब रिजल्ट आने पर छात्र ने की आत्महत्या.’ आखिर ऐसा कौन सा दबाव होता है कि बच्चे एक परीक्षा परिणाम से हार जाते हैं. 
घर में इतने लोग होते हैं क्यों नहीं कोई ऐसे नाजुक समय में उनकी मनोस्थिति को भाप पाता. क्या परीक्षा के इस परिणाम के आगे जीवन नहीं था? संभावनाएं नहीं थी? महज एक रिजल्ट के सामने बच्चे का पूरा अस्तित्व ही क्यों अनदेखा कर दिया गया? बच्चे पर नाराज होने की बजाय, यह एहसास क्यों नहीं कराया गया कि हर असफलता अपने साथ सफलता की ओर जानेवाली राह के निशान लाती है, हमें बस उसे पहचानना होता है और उस पर आगे बढ़ते जाने के लिए प्रयासरत रहना होता है.
देश-दुनिया में कई बड़ी शख्सीयतों के उदाहरण भी मौजूद हैं, जो इस बात को दर्शाते हैं. महात्मा गांधी व आइंस्टीन दोनों ही शुरुआती पढ़ाई में औसत थे. आइंस्टीन को तो मंदबुद्धि बालक माना जाता था. उनके स्कूल शिक्षक ने यहां तक कह दिया था कि यह लड़का जिंदगी में कुछ नहीं कर पायेगा. बड़े होने पर वह पॉलीटेक्निक इंस्टीट्यूट की प्रवेश परीक्षा में भी फेल हो गये. हालांकि, भौतिकी में उनके अच्छे नंबर आये थे, पर अन्य विषयों में वह बेहद कमजोर साबित हुए. अगर वह निराश हो गये होते, तो क्या उन्हें फादर ऑफ मॉडर्न फिजिक्स कहा जाता!
इसी तरह महात्मा गांधी भी एक औसत छात्र थे. बाद में वह वकालत की पढ़ाई करने लंदन गये. इसके बाद तो उनका जीवन जैसे पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया. इसलिए परीक्षा के परिणाम से जीवन नहीं तय होता, वह आगे बढ़ता है एक हार के बाद दूसरी जीत के लिए उठ खड़े होने से. अगर आपके बच्चे के नंबर कम आये हैं या वह फेल हो गया है, तो उसे सजा देने की बजाय उसे आगे बढ़ने का हौसला दें.
बच्चों की मनोस्थिति समझें
अकसर जाने-अजाने अभिभावक बच्चों की रुचि और इच्छा को जाने बिना अपनी महात्वाकांक्षाओं का भार उन पर डाल देते हैं. उन्हें एहसास कराने लगते हैं कि वे उनकी उम्मीदों को तोड़ें नहीं. ऐसे में बच्चों पर पहले से दबाव बना रहता है और अगर रिजल्ट बिगड़ जाये, तो कई बार बच्चे खुद को माता-पिता का दोषी मानने लगते हैं. अगर आप भी इस स्थिति में उन्हें ही दोषी ठहराने लगेंगे, तो वह गहरे अवसाद में जा सकते हैं.
इसलिए, उनके रिजल्ट स्वीकारें और आगे के लिए बेहतर रास्ता सुझाएं. उन्हें समझाएं कि एक असफलता से सफलता के रास्ते बंद नहीं होते. रिजल्ट के बाद उनके हाव-भाव पर नजर रखें, अगर वे उदास और चुप चुप से हैं तो किसी मनोचिकित्सक की मदद लें,उनकी काउंसलिंग करवायें. बच्चों को हमेशा इस बात का एहसास कराएं कि असफलता ही सफलता के नये द्वार खोलती है.

Friday, 21 November 2014

नेता लोग कुछ भी कर सकते है क्योंकि वो क़ानून बनाते है
हम कुछ नहीं कर सकते है क्योंकि कानून ही हमें रोकता है